बन्दौं सन्तोषी चरण, ऋद्धि सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर, दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे, सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब अब, आया तेरे धाम॥
श्री संतोषी माता चालीसा
॥ Doha ॥
बन्दौं सन्तोषी चरण, ऋद्धि सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर, दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे, सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब अब, आया तेरे धाम॥
॥ Chaupai ॥
जय सन्तोषी मात अनूपम।
शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥
सुन्दर वरण कमल सम लोचन।
दर्शन मात्र से भव भय मोचन॥
घट घट वासिनी अघ नासिनी।
भक्त मनोरथ पूरण हासिनी॥
शुक्रवार को जो नर ध्यावे।
सन्तोषी माँ की कृपा पावे॥
गुड़ और चना भोग जो लावे।
ताके घर आनन्द छावे॥
खटाई भूल के नहिं खावे।
माँ का व्रत जो नियम निबावे॥
पुत्र हीन जो व्रत को धारे।
ताके घर संतान पधारे॥
निर्धन होवे धनवान अपारा।
कष्ट मिटे सब संकट सारा॥
कन्या को सुयोग्य वर मिल जावे।
व्याह कारज शुभ आनन्दावे॥
अन्धों को तुम दृष्टि दिलावे।
कोढ़ी काया सुन्दर बनावे॥
बाँझ नारि जब व्रत को साधे।
पुत्र खिलावे मोद अगाधे॥
जहाँ तुम्हारा पाठ होवे।
तहाँ दुःख दरिद्र सब रोवे॥
आनन्द मंगल घर में छाये।
भूत पिशाच निकट नहिं आये॥
गणपति की तुम पुत्री कहाओ।
रिद्धि सिद्धि को संग में लाओ॥
शुभ और लाभ तुम्हारे भ्राता।
तुम हो सन्तोष की दाता॥
मैं हूँ दीन मलीन दुखारी।
शरण तुम्हारी आया भारी॥
कृपा दृष्टि करो जगदम्बा।
मत करो मोहे अब विलंबा॥
बुद्धिहीन तनु जानिके माता।
कृपा करो हे भाग्य विधाता॥
रोग शोक सब तुम ही हरती।
भक्तों के सब काज संवरती॥
अष्ट सिद्धि नव निधि की दाता।
सदा सहाय करो तुम माता॥
धन हीन जो जन तुमको गावे।
ताके घर सम्पत्ति अति आवे॥
रोगी जो यह पाठ करे नित।
रोग मुक्त होवे वह निश्चय॥
विद्या चाहन जो यह पाठ करे।
विद्यावान होवे वह निश्चय॥
जो जन यह पाठ प्रेम से गावे।
तापर कृपा तुम्हारी आवे॥
मनवांछित फल पावे निश्चय।
जो यह पाठ करे चित्त लाये॥
भक्त जनों की तुम हो रखवारी।
महिमा तुम्हारी अमित अपारी॥
मैं मूरख अज्ञान अनाड़ी।
नहिं जानूं कुछ महिमा तुम्हारी॥
क्षमा करो अपराध हमारे।
हम हैं दास प्रभु तुम्हारे॥
कृपा करो हे जगदम्बा।
मत करो मोहे अब विलंबा॥
सन्तोषी माता चालीसा जो गावे।
सब सुख भोग परम पद पावे॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, पाठ करे चित्त लाये।
सन्तोषी मैया की कृपा, तापर सदा सुहाये॥
हरिहर की तुम प्यारी माता।
सब जग की तुम प्राण विधाता॥
करहु कृपा हे परम भवानी।
जय जय जय जय जगदम्बा महारानी॥
जो नर व्रत में नियम को तोड़े।
ताके घर दुःख दारिद्र दौड़े॥
खटाई खाना है अपराध।
भक्तन को यह है परम प्रमाद॥
सोलह शुक्रवार व्रत साधे।
उद्यापन कर फल आराधे॥
प्रसाद बाँटें सबको घर घर।
सन्तोषी माँ करे घर भर॥
जय सन्तोषी माता जय जय।
भक्तन के दुःख हरनी जय जय॥
चरण कमल में शीश नवाऊँ।
कृपा तुम्हारी मैं नित पाऊँ॥
मैं हूँ बालक दीन तुम्हारा।
तुम ही हो मेरा एक सहारा॥
॥ Doha ॥
सन्तोषी माता दया करो, मेटो सकल क्लेश।
भक्त तुम्हारे चरण में, निशदिन ध्यावें शेष॥
Santoshi Mata is regarded as the goddess of contentment and fulfillment of wishes, whose worship is especially popular among women.
Fridays, and the Solah Shukravar (Sixteen Fridays) fast, are considered especially auspicious for worshipping Santoshi Mata.
The Chalisa describes Santoshi Mata's grace, the rules of her vrat (fast), and her glory in fulfilling devotees' wishes.