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पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नवाऊँ मैं।
कैसे श्री साईं बाबा को, अपना हाल सुनाऊँ मैं॥
साईं बाबा परम दयालु।
भक्तों के तुम हो कृपालु॥
शिर्डी गाँव में परगट भये।
सबके दुःख तुम हरन लये॥
कहाँ से आये कोई न जाने।
सब नर नारी तुमको माने॥
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई।
सबके तुम हो मेरे साईं॥
राम रहीम कृष्ण अवतारा।
साईं रूप में लिया संसारा॥
द्वारकामाई में रहे साईं।
सबको दर्शन दे सुखदाई॥
धुनी निरन्तर जलती रहे।
साईं नाम जो मन में कहे॥
उदी जो माथे पर लगावे।
सब रोग उसके मिट जावे॥
भिक्षा मांग कर उदर भरा।
साईं ने सबको पार करा॥
दीपक जलते बिना तेल के।
साईं दिखावे कई खेल के॥
पानी से दीपक जल जाते।
देख सभी अति विस्मित होते॥
श्रद्धा सबुरी मंत्र तुम्हारा।
जिसने जपा वो पार उतारा॥
साईं नाम जो जपे निरन्तर।
उसके घर में होवे जंतर॥
अन्नदान का बड़ा महत्व है।
साईं ने यह पाठ पढ़ाया॥
स्वयं पकाकर सबको खिलाते।
भूखे को तुम तृप्त कराते॥
कोई रोगी जो पास आवे।
उदी लगाते रोग मिटावे॥
तुम्हरी महिमा पार न पावें।
वेद पुराण भी गाते जावें॥
साईं साईं जो कोई गावे।
सब सुख भोग परम पद पावे॥
दीन दयाल दया करो साईं।
तुम हो जग के भाग्य विदाई॥
रोग शोक सब तुम ही हरते।
भक्तों के सब काज संवरते॥
मैं हूँ दीन मलीन दुखारी।
शरण तुम्हारी आया भारी॥
कृपा दृष्टि करो मेरे साईं।
मत करो मोहे अब विलंबा॥
बुद्धिहीन तनु जानिके साईं।
कृपा करो हे भाग्य विदाई॥
अष्ट सिद्धि नव निधि की दाता।
सदा सहाय करो तुम माता॥
पुत्र हीन जो जन तुमको ध्यावे।
पुत्र रत्न वह निश्चय पावे॥
धन हीन जो जन तुमको गावे।
ताके घर सम्पत्ति अति आवे॥
रोगी जो यह पाठ करे नित।
रोग मुक्त होवे वह निश्चय॥
विद्या चाहन जो यह पाठ करे।
विद्यावान होवे वह निश्चय॥
जो जन यह पाठ प्रेम से गावे।
तापर कृपा तुम्हारी आवे॥
मनवांछित फल पावे निश्चय।
जो यह पाठ करे चित्त लाये॥
भक्त जनों की तुम हो रखवारी।
महिमा तुम्हारी अमित अपारी॥
मैं मूरख अज्ञान अनाड़ी।
नहिं जानूं कुछ महिमा तुम्हारी॥
क्षमा करो अपराध हमारे।
हम हैं दास प्रभु तुम्हारे॥
कृपा करो हे जगदम्बा।
मत करो मोहे अब विलंबा॥
साईं चालीसा जो कोई गावे।
सब सुख भोग परम पद पावे॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, पाठ करे चित्त लाये।
साईं बाबा की कृपा, तापर सदा सुहाये॥
हरिहर की तुम प्यारी माता।
सब जग की तुम प्राण विधाता॥
करहु कृपा हे परम भवानी।
जय जय जय जय जगदम्बा महारानी॥
साईं चालीसा पढ़त ही, दूर होय दुःख क्लेश।
सुख सम्पति आनन्द बढे, मिटे सकल क्लेश॥