श्री नवग्रह स्तोत्रम् जपे, नवग्रह शांति सुहाय।
पीड़ा सब ग्रह की मिटे, मंगलमय फल दाय॥
॥ Doha ॥
श्री नवग्रह स्तोत्रम् जपे, नवग्रह शांति सुहाय।
पीड़ा सब ग्रह की मिटे, मंगलमय फल दाय॥
॥ Chaupai ॥
जय सूर्य देव जय रवि करन।
तेज प्रताप विश्व के भरण॥
जय चन्द्र देव जय सोमनाथ।
शीतलता के तुम हो नाथ॥
जय मंगल देव भूमि के लाल।
रण में तुम हो महा कराल॥
जय बुध देव जय सौम्य रूप।
विद्या बुद्धि के तुम हो कूप॥
जय गुरु देव बृहस्पति नाम।
देवों के तुम गुरु अभिराम॥
जय शुक्र देव भृगु के लाल।
असुरों के गुरु रूप विशाल॥
जय शनि देव जय रवि नन्दन।
न्याय देव तुम शिव के वन्दन॥
जय राहु देव जय छिन्न मस्तक।
छाया ग्रह तुम महा भयंकर॥
जय केतु देव जय पुच्छल तारे।
कष्ट हरो तुम भक्तन सारे॥
नवग्रह मिलकर सुख दुख दाता।
कर्मों का फल नवग्रह पाता॥
सूर्य उच्च हो तेज बढ़ावे।
नीच होय तो मान घटावे॥
चन्द्रमा मन का है स्वामी।
सुख शान्ति का यह अनुगामी॥
मंगल साहस का है दाता।
रक्त और भूमि का विधाता॥
बुध वाणी का है अधिपति।
व्यापार और बुद्धि की गति॥
गुरु ज्ञान का भण्डार है।
संतान और धन का सार है॥
शुक्र प्रेम और सुख का दाता।
कला और सौंदर्य विधाता॥
शनि कर्मों का है फल दाता।
दुःख और पीड़ा का विधाता॥
राहु भ्रम और छाया है।
अकस्मात लाभ की माया है॥
केतु मोक्ष का है अधिपति।
ज्ञान और वैराग्य की गति॥
नवग्रह शान्ति जो नर करावे।
सारे कष्ट उसके मिट जावे॥
नवग्रह का जो पाठ करे।
ग्रह दोष उसके सब टरे॥
नवग्रह मन्त्र जपे जो कोई।
उसके घर में शान्ति होई॥
नवग्रह यन्त्र रखे जो पास।
सारे विघ्न हो जावे नाश॥
नवग्रह दान करे जो कोई।
सुख सम्पति उसके घर होई॥
नवग्रह हवन करे जो नर।
सारे रोग मिटे घर भर॥
नवग्रह व्रत जो नर धारे।
उसके सब संकट टल सारे॥
नवग्रह दर्शन जो नर पावे।
उसका सब दुःख मिट जावे॥
नवग्रह पूजा जो नर करावे।
सारे सुख वह निश्चय पावे॥
नवग्रह आरती जो नर गावे।
नवग्रह देव की कृपा पावे॥
नवग्रह चालीसा जो कोई गावे।
सब सुख भोग परम पद पावे॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, पाठ करे चित्त लाये।
नवग्रह देव की कृपा, तापर सदा सुहाये॥
हरिहर के तुम प्यारे ग्रह।
सारे ब्रह्माण्ड के तुम ग्रह॥
करहु कृपा हे परम ग्रह।
जय जय जय जय नवग्रह॥
सूर्य चन्द्र मंगल बुध।
गुरु शुक्र शनि राहु केतु॥
नवग्रह मिल कर करो कृपा।
हम पर होवे सदा दया॥
जय नवग्रह जय नवग्रह नाथ।
मैं हूँ सदा तुम्हारे साथ॥
चरण कमल में शीश नवाऊँ।
कृपा तुम्हारी मैं नित पाऊँ॥
मैं हूँ बालक दीन तुम्हारा।
तुम ही हो मेरा एक सहारा॥
क्षमा करो अपराध हमारे।
हम हैं दास प्रभु तुम्हारे॥
कृपा करो हे नवग्रह देवा।
हम हैं तेरी करते सेवा॥
॥ Doha ॥
नवग्रह चालीसा पढ़त ही, दूर होय ग्रह दोष।
सुख सम्पति आनन्द बढे, मिटे सकल ग्रह रोष॥
नवग्रह — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु — जीवन पर अपने प्रभाव के लिए ज्योतिष में विशेष महत्व रखते हैं।
ग्रह दोष, शनि की साढ़ेसाती और राहु-केतु दोष को शांत करने के लिए नवग्रह चालीसा का पाठ किया जाता है।
यह चालीसा नवों ग्रहों की स्तुति करते हुए उनके शुभ प्रभाव की कामना और अशुभ प्रभाव को शांत करने की प्रार्थना करती है।