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पार्वती
पिता: अनादि, माता: अनादि
कैलाश पर्वत • स्मशान • हृदय (भक्तों के)
Feb/Mar • भारत
• भारत (विशेषकर उत्तर भारत)
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख; शिवभक्तों का सर्वोच्च तीर्थ
Google Maps पर देखेंमहाशिवरात्रि प्रायः फाल्गुन या माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती है (Feb/Mar)। यह दिन शिव-तत्त्व के जागरण और आत्म-ज्ञान का प्रतीक है। भक्त रात्रि जागरण, व्रत, शिवलिंग पर जल/दूध/द्रव्याभिषेक और भजन-कीर्तन करके शिव की आराधना करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से महाशिवरात्रि अहंकार-त्याग, ध्यान और मोक्ष की ओर झुकाव बढ़ाने का अवसर मानी जाती है—कई परम्पराओं में इसे आत्म-शुद्धि का दिन कहा जाता है।
‘भोलेनाथ’ का अर्थ है ‘भोला-भाला देवता’—क्योंकि भक्तों की निष्ठा और सच्चे मन से अर्पित भक्ति से वे शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। परन्तु भोलेपन का अर्थ मतिभ्रष्टता नहीं; शिव गूढ़ आदर्शों और तत्त्वज्ञान के आधार पर निर्णय लेते हैं। उनकी सरलता भक्तपरकता का प्रतीक है—वे किसी भी सच्चे ह्रदय की पुकार सुनते हैं।
शिवलिंग अनंत चेतना तथा निराकार शिव के प्रतीक के रूप में पूजनीय है—यह निराकार तेज और सत्व का चिन्ह है। कुछ परंपराओं में लिंग को सर्जनात्मक शक्ति और पुरुषत्व की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कहा जाता है; वहीं अन्य दृष्टांत इसे ब्रह्म-तत्त्व की अनंतता के रूप में देखते हैं। शिवलिंग पर अभिषेक द्वारा भक्त अपनी श्रद्धा और तर्पण व्यक्त करते हैं।
बिल्व/बेलपत्र को शिव की विशेष प्रिय वस्तु माना जाता है — इसकी तिन पत्तियाँ त्रिदेव/त्रिगुण या त्रतीय गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। बेलपत्र पर जल और धूप-डाले जाने से शिव प्रसन्न होते हैं। परम्परा यह भी बताती है कि बेलपत्र का ताज़ा और स्वच्छ होना चाहिए और उसका अर्पण मन की शुद्धि का संकेत होता है।
शिव-भक्ति अनेक भक्तों के लिए जीवन में आंतरिक परिवर्तन, संयम और मानसिक दृढ़ता लाती है। साधना—जैसे जप, ध्यान, व्रत और भजन—मन को केंद्रित करती है और अनावश्यक प्रवृत्तियों में कमी लाती है। पर परिवर्तन का वास्तविक आधार नियमित साधना, नैतिक प्रयास और आत्म-निरीक्षण है; शिव-आराधना एक मार्गदर्शक और प्रेरक शक्ति के रूप में काम करती है।
नटराज का तांडव केवल संहार ही नहीं बल्कि सृष्टि, पालन और संहार—तीनों का नृत्य है। यह समय, परिवर्तन और सृजन के चक्र का प्रतीक है। तांडव से यह भी सन्देश मिलता है कि सृष्टि की लय और परिवर्तन अपरिहार्य हैं—तब भी साधक शांतचित्त होकर अपने मार्ग पर अडिग रहे।
घरेलू पूजा के लिए स्वच्छ स्थान पर शिवलिंग/चित्र रखें, जल, दूध, दही और बेलपत्र से अभिषेक करें, दीप और धूप जला कर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें। संकीर्तन या श्लोक (जैसे शिव पंचाक्षर या महामृत्युंजय) का पाठ करें। पूजा के दौरान भक्त का मन शुद्ध और समर्पित होना आवश्यक है—यही सबसे बड़ा अर्पण है।
प्रमुख मन्त्रों में 'ॐ नमः शिवाय' (शिव को नमन) और 'महामृत्युंजय मंत्र' शामिल हैं। 'ॐ नमः शिवाय' साधारण परंतु शक्तिशाली है—यह ध्यान को केन्द्रित करता है; 'महामृत्युंजय' जीव-रक्षण, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिये पारंपरिक रूप से जपा जाता है। मंत्रों का प्रभाव श्रद्धा और अभ्यास पर निर्भर होता है।
शिव का सम्बन्ध मृत्यु, अनासक्ति और वैराग्य से होने के कारण स्मशान और तत्त्व-स्थलों का खास महत्व है—यह संसार की अनित्य प्रकृति को समझने व अनासक्त रहने का व्यावहारिक प्रतीक है। साधु-संप्रदाय और तपस्वी शिव की आराधना स्मशान में भी करते रहे हैं—यह आंतरिक मृत्यु (अहंकार की मृत्यु) और पुनर्जन्म-रहित चेतना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
हाँ—शिव को योगेश्वर कहा जाता है और वे योग के आदर्श शिक्षक माने जाते हैं। शिव-भक्ति का ध्यान, समाधि और तत्त्व-ज्ञान से जुड़ा है; साधक शिव की साधना द्वारा आंतरिक शांति, अनुशासन और ध्यान-क्षमता प्राप्त कर सकता है। वैराग्य और आत्म-नियमन शिव-योग की प्राथमिक विशेषताएँ हैं।
शिव के अनेक रूप हैं—कुछ प्रमुख रूप हैं: नटराज (नृत्यरूप), भूतनाथ/रुद्र (राक्षसों के रक्षक), महादेव (सर्वशक्तिमान), लिंगराज/लिङ्ग (निराकार तत्त्व), दयालु भोलेनाथ (भक्त-प्रिय)। हर रूप का अलग आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ है, और भक्त अपनी प्रवृत्ति के अनुसार किसी रूप की आराधना करते हैं।