श्री शीतला माता चालीसा

पवित्र पाठ

24

॥ Doha ॥

जय जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान।

होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बलज्ञान॥

॥ Chaupai ॥

जय जय जय शीतला भवानी।

जय जग जननि सकल गुणखानी॥

गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजित।

पूरण शरदचंद्र समसाजित॥

विस्फोटक से जलत शरीरा।

शीतल करत हरत सब पीरा॥

मातु शीतला तव शुभनामा।

सबके गाढ़े आवहिं कामा॥

शोकहरी शंकरी भवानी।

बाल प्राण रक्षी सुख दानी॥

शुचि मार्जनी कलश कर राजै।

मस्तक तेज सूर्य सम साजै॥

चौंसठ योगिन संग में गावैं।

वीणा ताल मृदंग बजावैं॥

नृत्य नाथ भैरो दिखरावैं।

सहज शेष शिव पार न पावैं॥

धन्य धन्य धात्री महारानी।

सुरनर मुनि तब सुयश बखानी॥

ज्वाला रूप महा बलकारी।

दैत्य एक विस्फोटक भारी॥

घर घर प्रविशत कोई न रक्षत।

रोग रूप धरि बालक भक्षत॥

हाहाकार मच्यो जगभारी।

सक्यो न जब संकट टारी॥

तब मैया धरि अद्भुत रूपा।

कर में लिये मार्जनी सूपा॥

विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो।

मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥

बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा।

मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥

अबनहिं मातु काहु गृह जइहौं।

जहं अपवित्र सकल दुःख हरिहौं॥

भभकत तन शीतल ह्वै जइहैं।

विस्फोटक भयघोर नसइहैं॥

श्री शीतलहिं भजे कल्याना।

वचन सत्य भाषे भगवाना॥

विस्फोटक भय जिहि गृह भाई।

भजै देवि कहं यही उपाई॥

कलश शीतला का सजवावै।

द्विज से विधिवत पाठ करावै॥

तुम्हीं शीतला जग की माता।

तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥

तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी।

नमो नमामि शीतले देवी॥

नमो सुखकरणी दुःखहरणी।

नमो नमो जगतारणि तरणी॥

नमो नमो त्रैलोक्य वन्दिनी।

दुख दारिद्रादिक कन्दिनी॥

श्री शीतला शेढ़ला महला।

रुणलीह्युणनी मातु मंदला॥

हो तुम दिगम्बर तनुधारी।

शोभित पंचनाम असवारी॥

रासभ खर बैशाख सुनन्दन।

गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन॥

सुमिरत संग शीतला माई।

जाहि सकल दुख दूर पराई॥

गलका गलगण्डादि जु होई।

ताकर मंत्र न औषधि कोई॥

एक मातु जी का आराधन।

और नहिं कोई है साधन॥

निश्चय मातु शरण जो आवै।

निर्भय मन इच्छित फल पावै॥

कोढ़ी निर्मल काया धारै।

अंधा दृग निज दृष्टि निहारै॥

वंध्या नारि पुत्र को पावै।

जन्म दरिद्र धनी होई जावै॥

मातु शीतला के गुण गावत।

लखा मूक को छंद बनावत॥

यामे कोई करै जनि शंका।

जग में मैया का ही डंका॥

भनत रामसुंदर प्रभुदासा।

तट प्रयाग से पूरब पासा॥

पुरी तिवारी मोर निवासा।

ककरा गंगा तट दुर्वासा॥

अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत।

मातु कृपा कौ बाट निहारत॥

पड़ा क्षर तव आस लगाई।

रक्षा करहु शीतला माई॥

॥ Doha ॥

घट घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार।

शीतल छइयां में झुलई, मइया पलना डार॥