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स्वतंत्र (कभी-कभी ब्रह्मा से संबंध जोड़ा जाता है)
पिता: ब्रह्मा (पौराणिक परंपरा अनुसार), माता: अज्ञात/अनादि शक्ति
ब्रह्मलोक • विद्या के केन्द्र • भक्तों के हृदय
Jan/Feb • भारत, नेपाल, बांग्लादेश
काश्मीर (अब पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र)
प्राचीन विद्या पीठ, जहाँ से शारदा लिपि का प्रसार हुआ
Google Maps पर देखेंवसंत पंचमी, जिसे सरस्वती जयंती भी कहा जाता है, माघ शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। इस दिन विद्यार्थी और कलाकार देवी सरस्वती की आराधना करते हैं। पुस्तकें, वाद्य और शैक्षिक सामग्री उनके समक्ष रखकर आशीर्वाद माँगा जाता है। पीले वस्त्र पहनना और पीला प्रसाद अर्पित करना शुभ माना जाता है।
सरस्वती को श्वेत वस्त्रधारी, कमल पर आसनस्थ और चार भुजाओं में वीणा, पुस्तक, जप माला और वर मुद्रा के साथ चित्रित किया जाता है। उनका वाहन हंस या मोर है। यह स्वरूप शुद्धता, ज्ञान और कला का प्रतीक है।
सरस्वती को श्वेत और पीले रंग के प्रसाद प्रिय माने जाते हैं। पीली मिठाइयाँ, खीर, फल और सफेद पुष्प अर्पित करना उत्तम है। परन्तु सबसे बड़ा प्रसाद है अध्ययन और विद्या के प्रति निष्ठा।
‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ जैसे बीज मंत्र का जप करने से वाणी में मधुरता, स्मरण शक्ति में वृद्धि और अध्ययन में सफलता मिलती है। विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी के समय सरस्वती की आराधना करते हैं।
भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया (बाली) और जापान में भी सरस्वती की पूजा होती है। बौद्ध और हिंदू दोनों परम्पराओं में वे ज्ञान और कला की देवी मानी जाती हैं।
सरस्वती का वाहन हंस है। हंस विवेक का प्रतीक है—कथानुसार हंस दूध और पानी को अलग कर सकता है। यह गुण विवेक और शुद्ध ज्ञान का प्रतीक है, जो सरस्वती का मुख्य वरदान है।
हाँ, विद्यार्थी सरस्वती की पूजा करके अध्ययन में सफलता और वाणी की स्पष्टता की प्रार्थना करते हैं। परीक्षा के समय विशेष रूप से ‘सरस्वती वंदना’ गायी जाती है—हे सरस्वती, हमें ज्ञान, स्मरण शक्ति और बुद्धि प्रदान करें।
ऋग्वेद में सरस्वती को एक नदी और ज्ञान की देवी दोनों रूपों में वर्णित किया गया है। उन्हें वाक् की अधिष्ठात्री कहा गया है और ऋग्वेद के सरस्वती सूक्त में उनका गुणगान मिलता है।