
मानसिक जाप का रहस्य: बिना होंठ हिलाए ईश्वर का स्मरण
वाचिक (बोलकर) जाप की तुलना में मानसिक जाप 100 गुना अधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसे कैसे करें? अजपा जाप क्या है? जानिए साधना का सर्वोच्च स्तर।
मानसिक जाप क्या है?
मानसिक जाप का अर्थ है पूरी चेतना के साथ मन-ही-मन मंत्र का दोहराव करना। इस अवस्था में, न तो होंठ हिलते हैं और न ही जीभ। आप केवल अंदर ही अंदर मंत्र को 'सुनते' हैं और महसूस करते हैं।
यह जाप का सबसे उन्नत रूप माना जाता है। मनुस्मृति के अनुसार, वाचिक जाप (ज़ोर से बोलना) सामान्य फलदायी होता है, उपांशु जाप (फुसफुसाना) उससे 10 गुना अधिक फलदायी होता है, लेकिन मानसिक जाप 100 गुना अधिक शक्तिशाली होता है क्योंकि इसमें बाहरी विक्षेप शून्य होता है।
इसमें मन को मंत्र पर तब तक एकाग्र करना होता है जब तक कि यह स्वतः चलने वाली प्रक्रिया न बन जाए।
अजपा जाप की सर्वोच्च अवस्था
अंततः, लगातार अभ्यास से यह 'अजपा जाप' में बदल जाता है। 'अ-जपा' यानी जिसे ਜपਾ न जाए, जो अपने आप होने लगे। जैसे आपकी सांस खुद-ब-खुद चलती है, वैसे ही मंत्र आपके अवचेतन (Subconscious) में पूरी गति से स्वतः बजने लगता है।
साधाक इसे अपनी सांस के साथ जोड़ देते हैं—श्वास लेते समय 'राम' और छोड़ते समय पुनः 'राम'। एक बार जब जाप श्वास और हृदय की धड़कन के साथ जुड़ जाता है, तो आप सोते हुए भी पूजा की स्थिति में होते हैं।
यह वह अवस्था है जहां भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं बचता और अपार आनंद (Bliss) की प्राप्ति होती है।

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