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विष्णु
पिता: समुद्र (पौराणिक), माता: अज्ञात
वैकुण्ठ लोक • क्षीरसागर
Oct/Nov • भारत, नेपाल
Sep/Oct • पूर्वी भारत (विशेषकर बंगाल, ओडिशा)
महाराष्ट्र
शक्ति पीठों में से एक; महालक्ष्मी का प्राचीन मंदिर
Google Maps पर देखेंदिल्ली
आधुनिक और प्रसिद्ध लक्ष्मी-नारायण मंदिर
Google Maps पर देखेंतिरुपति, आंध्र प्रदेश
तिरुपति बालाजी से जुड़ा; लक्ष्मी का अवतार माना जाता है
Google Maps पर देखेंपौराणिक कथा अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब देवता और दैत्य अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, तब चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी जी प्रकट हुईं। वे स्वयं विष्णु के वक्षस्थल में श्री रूप से प्रतिष्ठित हुईं और उनकी अर्धांगिनी बनीं।
दीपावली कार्तिक अमावस्या की रात्रि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इस रात लक्ष्मी जी घर-घर भ्रमण करती हैं और स्वच्छ, प्रकाशित तथा भक्ति से भरे घर में प्रवेश कर समृद्धि प्रदान करती हैं। व्यापारी भी इस दिन अपने नए खातों और व्यापार की शुरुआत करते हैं।
लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। उल्लू रात्रि में भी देख सकता है—इसलिए वह विवेक, दूरदर्शिता और अंधकार में मार्गदर्शन का प्रतीक है। यह सिखाता है कि धन का उपयोग विवेकपूर्वक करना चाहिए, अन्यथा वह नाशकारी भी हो सकता है।
लक्ष्मी पूजन में स्वच्छ दीपक, लाल/पीले पुष्प, धूप, मिठाई और विशेष रूप से सिक्के या मुद्रा अर्पित की जाती है। कमल का फूल और शंख का जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। परन्तु सबसे बड़ा अर्पण है—सच्चा परिश्रम और धर्मयुक्त धनार्जन।
कोजागरी पूर्णिमा आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की रात्रि को मनाई जाती है। इस दिन लक्ष्मी जी की विशेष पूजा होती है। लोग रातभर जागरण करते हैं, क्योंकि मान्यता है कि लक्ष्मी रात्रि में पूछती हैं—'को जागर्ति?' (कौन जाग रहा है)। जागरण करने वाले भक्त को विशेष आशीर्वाद मिलता है।
लक्ष्मी केवल भौतिक धन की अधिष्ठात्री नहीं, बल्कि धर्मयुक्त धन और संतुलन की प्रतीक हैं। वे सिखाती हैं कि धन का सदुपयोग धर्म, दान और समाज कल्याण में होना चाहिए। उनका स्वरूप समृद्धि के साथ-साथ संतोष और संतुलन का भी संदेश देता है।
घर और हृदय की स्वच्छता, सत्य-धर्म का पालन, दान, अतिथि सेवा और परिश्रम—ये लक्ष्मी कृपा पाने के मुख्य उपाय बताए गए हैं। केवल धन संग्रह नहीं, बल्कि उसका धर्मसम्मत उपयोग करना ही वास्तविक लक्ष्मी प्राप्ति है।
कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर (महाराष्ट्र), पद्मावती मंदिर (तिरुपति), लक्ष्मी नारायण मंदिर (दिल्ली), और लक्ष्मी देवी मंदिर (कर्नाटक) प्रमुख हैं। दीपावली और विशेष अवसरों पर लाखों भक्त यहाँ दर्शन करते हैं।
लक्ष्मी को 'श्री' कहा जाता है क्योंकि वे ऐश्वर्य, समृद्धि और मंगल की अधिष्ठात्री हैं। संस्कृत में 'श्री' शब्द समृद्धि और शुभ का द्योतक है। इसलिए हर शुभ कार्य में 'श्री' का उच्चारण अनिवार्य माना जाता है।